Saturday, June 21, 2014


My father remembers a lot of Urdu and Hindi poetry. I love listening to short or long poetry from him. For me, having grown up in Hindi, English and Gujarati world, Urdu represented my father's generation. It represented तहज़ीब, it represented wisdom and elegance. The words, the deep meaning, the way the words flow from your tongue even in a short two line couplet just touches my heart.

Last time when I went and lived with my father in fall-winter of 2012 (he was 82 years old then), I wrote down some of his Hindi and Urdu poems that he often remembers and recites. Today, I wanted to share one of the Hindi poems he remembers from his youth, called ज़िन्दगी (Life).

Published on 21st October 1951
Navbharat Times

विश्व में परिवर्तनों का नाम केवल ज़िन्दगी 
रात की इन तड़पनो का नाम केवल ज़िन्दगी 
हो गया थिर जो उसे पाषाण कहना चाहिए 
एक गतिमय जीव को इंसान कहना चाहिए 
जिन विचारो को बदलने की कभी आदत नहीं 
उन विचारो को सदा समशान कहना चाहिए 
शक्तिशाली जीवनो का नाम केवल ज़िन्दगी 

आँख दो टकरा गयी हो जब किसी के लोचनो से 
हो गया हो मुग्ध जो भी रूप के कुछ कंपनो से 
मौन जीवन वाटिका में प्यार के तरुवर तले 
मिल गए हो प्राण जिसको राह में आनेबनो से 
उन मिलन के दो क्षणों का नाम केवल ज़िन्दगी 

कर्म करते है निरंतर पर कभी कहते नहीं 
शीश देते है मगर अपमान को सहते नहीं 
बाँध कर टूटी जिन्हे दीवार कारावास की 
जो गुलामी में किसी के एक पल रहते नहीं 
उन नरो के दर्शनों का नाम केवल ज़िन्दगी 

बंधनो से चाहता है मुक्त होना सब ज़माना 
चाहता हूँ में किसी के लोचनो में घर बनाना 
बंध गया जो दो भुजो के बंधनो में एक पल भी 
चाहता हूं मौन कारावास में जीवन बिताना 
प्यार के इन बंधनो का नाम केवल ज़िन्दगी 

खेल जाते वीरवर हँसते हुए निज प्राण पर 
आंच पर आने नहीं देते कभी सन्मान पर 
शत्रुओं के नाश को संघर्ष में चमकी हो जो 
खौल उठता रिक्त जिनके एक ही एह्वान पर 
तल्वार की उन झुंझुनो का नाम केवल ज़िन्दगी 

जब जवानी रूप में लिपटी हुई गाती हुई 
प्यार पथ पर ठोकरें आती चली खाती हुई 
पायलों की रुंझुनाहट कान में आती है जब 
भाग जाती नींद भी जब रात को आती हुई 
उन नूपुरों की रुंझुनो का नाम केवल ज़िन्दगी

Monday, February 18, 2013

Back to the state side, a quick post

I started my sabbatical about 6 months ago. That included not doing much, attending a 10 day workshop of silent meditation, catching up on fiction reading, traveling a little, and spending time with my family in India. After our travels we are back to the states and I have much to share. We have a cool new place and we are almost unpacked. I am back to exercising and the normal life has started. No more staying out of the suitcases. Phew.

I am also doing this project which was on my to-do list for almost a decade. I want to get rid of all my CDs. I don't want to see them. I have been ripping them here and there but I always wanted a complete solution that did not require me to rip them again. Especially after the advent of the iPod, the iTunes, this was possible. Now with dropbox we never give anyone a physical CD anymore, so why have them occupying space at home. So, this is my solution. If you think there is a better solution, or if I have overlooked something, do let me know. 


  1. Music Archive files should be ripped in an open format and lossless from where I can import into any software/format in the future.
  2. iTunes running on all my computers should have access to high bit rate, may be not lossless, music so they can be played on good speakers with high quality.
  3. The iPhone should always sync from the laptop as it goes everywhere with me.

Current devices:

  • A desktop pc, a macbook, a laptop pc and a 1 TB NAS

The solution:

  • Rip the CDs in a lossless wav format using Windows media player and store it on the RAID
  • Rip the CDs in mp3s at 256 320 Kbps and copy the collection on all the computers
This will ensure that I always have access to the CD data in the wav format if needed. The iTunes running on all the computers will have access to good enough music which can be played in decent speakers whether attached to the desktop or the TV using Airplay on Apple TV. After 192 Kbps, the human ear cannot differentiate the improvement in quality but with space getting cheaper by the day, how much bigger would be the files at 256 320 Kbps anyway. It is a long laborious process but if I don't do this now, I will never do it. No more CDs!! I am storing the CDs in storage and getting rid of all the plastic covers. 

Monday, October 18, 2010

Loan, लो न

I have subscribed to SBS Radio's Hindi podcast. They usually have Australia specific stuff but once in a while, they cover general issues. Its refreshing to hear pure hindi. One of their episodes had poetry reading by Ashok Chakradhar. He read his latest on Loan. You can hear him here. What wonderful words and an apt message for the times we live in. I am reproducing it here for you.

अशोक चक्रधर - लोन

ज़िन्दगी में चलता है झींकना झिकाना
दो पडोसी थे, एक का नाम फलाना एक का नाम ढिकाना |
फलाना बोला "ढिकाने, रात में पूरी एक बोतल तुने लगाई थी ठिकाने
राम जाने कैसे जी रहा है,
छत पर टीन नहीं है
और सुबह सुबह फिर से neat पी रहा है?"

तो गिलास को गटकते हुए
और थोडा सा अटकते हुए
कहने लगा ढिकाना,
"यार फलाने, तुझे क्या बताना
अपुन कभी पानी नहीं मिलाता है
जैसे ही सामने neat आती है
मुह में पानी आ जाता है |
अपना काम तो प्यारे neat से ही चलता है
तू क्यों जलता है?
By God, ज़माना बड़ा ज्वलनशील है
लेकिन neat ही चलनशील है |
और तेरा बेटा नीटूं नेट पर neat neat नट नटी देखता है
विदेशी कायाएं सटी सटी देखता है,
हो सके तो उस में शर्म का पानी मिला
भाई मेरे गिलास से कैसा गिला ?
Neat पर क्यों भवंडर करता है,
आजकल हत्यारा भी neat पीकर neatly murder करता है |
neat फर्श neat कालीन
सफाई से निकल आए neat and clean |
यानी के फलाने अगर बहुत ऊपर बहुत ऊपर बहुत ऊपर fly करना हो
मारना नहीं खुद मरना हो
तो neat baygone spray पीओ neat अल्फास खाओ
neat ज़हर पीओ और कुनबे के साथ मर जाओ |

बचपन में मिलते थे आने दो आने
साले खर्च ही नहीं होते थे फलाने
और अगर कभी मिल जाए एक रुपैया
तो दैया रे दैया

रूपया देकर चीज़ खरीदी बाकी बची अठन्नी
आठ आना दे चीज़ खरीदी बाकी बची चवन्नी
चार आना दे चीज़ खरीदी बाकी बची दुअन्नी
दो आना दे चीज़ खरीदी बाकी बची एकन्नी
एक आना दे चीज़ खरीदी बाकी बचा अधन्ना
उस में भी कुछ चीज़ आ गई ताक धिना धिन धिन्ना
इतनी चीज़े मिली फलाने ठाठ हो गए ठेठ
अकड़े अकड़े घूमा करते बने अधन्ना सेठ
लेकिन मेरे मुन्ना,
गायब हुआ अधन्ना
गायब हुई एकन्नी
गायब हुई दुअन्नी
गायब हुई चवन्नी
गायब हुई अठन्नी
बाकी बचा रुपैया
उसकी मेरे भैया मरी हुई हैं नानी
साफ़ हवा भी नहीं मिलेगा और न ताज़ा पानी
खाना पीना करना हो तो लेना होगा LOAN
एक रुपय में कर सकते हो केवल telephone |
और फलाने तुम्हे इतना और बताएँगे
फ़ोन भी तुम्हे नहीं करना उधर से ही आएंगे |
तुम मजमे में हो या मेज़ पर
सजनी के संग हो या सेज पर
असमय घन्घनायेंगे
कान में स्वर आएंगे
"Mr. फलाने My name is रूबी राने
I know that you are in your bedroom in your लिहाफ
but on the behalf of bank YCYCY
we are giving you an offer and you can't deny
that you need a car loan, or a घरबार loan
or a कारोबार loan or any प्रकार of loan,
so why to waste time, करिए संपर्क
no need of guarantor no paperwork
लीजिये loan, very easy loan"
बड़ा मीठा स्वर फलाने बड़ी प्यारी tone

तुमने तत्काल फ़ोन नहीं काटा
तो समझो मछली में लग गया काँटा
फलाने तुम फंस गए
और मौत के मुह में धंस गए
फलाने एक शब्द है जो खुद आया है समझाने
जो उन्दर से बोलता है
तमन्नाओं के अँधेरे में अक्कल की खिड़की खोलता है
लेकिन मियां, न तो उसका उजाला दिखाई देता है
और न सुनाई देती है उसकी ध्वनियाँ
वो शब्द है loan
जो तुमसे कहता है लो न
तुम उस पर ध्यान दो न

तुम अपने चमन में चैन से चादर में पैर फैलाए सो रहे थे
अगल बगल बच्चे सपनों में मगन हो रहे थे
अचानक आया एक विदेशी बैंक दैत्य का साया
उसने फैलाई माया
चादर में पाँव पकडे खिंच कर लम्बे कर दिए
और होड़ की दौड़ की हवस से भर दिए
फिर कहा 'माना की तुम्हारे पास दाल है रोटी है
मगर तुम्हारी चादर छोटी है |
बड़ा मकान नहीं है बड़ी दूकान नहीं है
बड़ी कार नहीं है बड़ा व्यापार नहीं है
हमारी बात पर ध्यान दो न
हम तुम्हे लोन देंगे लो न |'

अपने चादर के हिसाब से पाँव नहीं सिकोड़े
वक्त पर किश्त नहीं दे पाए तो बन गए भगौड़े
कभी इस side भागे तो कभी उस side
रास्ता बंद दिखा तो कर लिया suiside |
लोन की चादर ख़ुशी की जगह खेद हो गई
अचानक रंगीन से सफ़ेद हो गई
समृद्धि की नुमाइश उस चादर के निचे दफ़न हो गई
लोन की चादर कुनबे के लिए कफ़न हो गई |
पहले लगता था की बैंक कितना पवित्र स्थान है
खुशियों का खज़ाना समस्याओं का निदान है
बैंक का लोन वाह क्या बात है ?
लेकिन अब तो हर विदेशी बैंक के पास बाहुबलियों और गुंडों की जमात है

फलाने इंसान की हवस तो घटा
तू तो यह बता
क्या किसी जानवर का जंगल में खाता है ?
जितना ज़रूरी हो उतना ही खाता है
पक्षी अपना घोंसला अपने हौंसले से बनाता है
बाज़ों से ब्याज पर धन नहीं उठाता है
बैंकों में ब्याज का बाज़ मारता है झपट्टा
उतारता है इज्ज़त सरे आम खींचता है घर का दुपट्टा
बड़े मकान में चार दिन तो सुख से रह लोंगे
लेकिन क्या विदेशी बैंको के बाहुबलियों की मार को सह लोंगे ?
neat देखके मुह में पानी आता है
लेकिन फलाने मुझे मालूम है
यह रास्ता कहाँ जाता है |
वाह रे बैंक तेरा एहसान
विदर्भ में रोज़ मर रहे है किसान
ज़िन्दगी का बाँध टूट कर लहू की लहर बन गया है
अखबार का हर पन्ना आत्महत्याओं की नेहर बन गया है
लोन की किश्तों का कहर कुनबे की साँसों का ज़हर बन गया है |

अरे सबके पास कुदरत का बनाया हुआ आवास है
छत के लिए इतना बड़ा आकाश सबके पास है
धरती सबके पावों को टिकाती है
क्या कभी किसी को गिरती है ?
हवा हमे मुफ्त में मिलती है
पानी तुम ओख से पी सकते है
जितनी उम्र है शौख से जी सकते है
न तो भागो न लोन मांगो
लेकिन तुम अपनी ताकत भूल गए
खामखाँ पंखे से झूल गए

फलाने चादर को चादर ही रहने दो उसे कफ़न मत बनाओ
बाज़ार की चकाचौंध पर मत जाओ
इच्छाओं पर अंकुश लगाओ
फलाने इससे पहले की बैंक का कोई बाहुबली मुझे जूते चप्पलो की treat दे दे
ला एक गिलास neat दे दे

पूरा बदन बिना पिटाई के दुख रहा है
मुह मैं पानी नहीं है हलक सूख रहा है
हलक में अटका है एक शब्द
जो चीख चीख कर कहता है
लो न, लो न, लो न
पर तुम इस पर ध्यान
दो न, दो न, दो न...." ||

Sunday, August 16, 2009

हम करें राष्ट्र आराधन

If I haven't told you before, I am saying it now. I love this song. This song is from hindi TV serial Chanakya that was aired on Doordarshan in 1990. I don't know how I missed it, but when I saw it years ago, I was so impressed and fascinated that I bought the whole DVD set of 47 episodes and watched it everyday after work till it was over. It shows how Chanakya, a pioneering professor of Political Science and Economics around 300 BC, brought the whole nation together and installed Chandragupta Maurya as the emperor of united India, "Bharat", for the first time in the history. This song is sung by all the students of Takshashila University in the TV series. I couldn't find when this song was written, but it seems that it was written by D.Lit Mr. Vishwanath Shukla. You can see it here and here are the lyrics for this song..

हम करें राष्ट्र आराधन
हम करें राष्ट्र आराधन.. आराधन

तन से, मन से, धन से
तन मन धन जीवन से
हम करें राष्ट्र आराधन
हम करें राष्ट्र आराधन.. आराधन

अंतर से, मुख से, कृति से
निश्चल हो निर्मल मति से
श्रद्धा से मस्तक नत से
हम करें राष्ट्र अभिवादन
हम करें राष्ट्र अभिवादन

हम करें राष्ट्र आराधन
हम करें राष्ट्र आराधन.. आराधन

अपने हँसते शैशव से
अपने खिलते यौवन से
प्रौढ़ता पूर्ण जीवन से
हम करें राष्ट्र का अर्चन
हम करें राष्ट्र का अर्चन

हम करें राष्ट्र आराधन
हम करें राष्ट्र आराधन.. आराधन

अपने अतीत को पढ़कर
अपना इतिहास उलट कर
अपना भवितव्य समझ कर
हम करें राष्ट्र का चिंतन
हम करें राष्ट्र का चिंतन

हम करें राष्ट्र आराधन
हम करें राष्ट्र आराधन.. आराधन

है याद हमें युग युग की
जलती अनेक घटनायें,
जो माँ की सेवा पथ पर
आई बन कर विपदायें,
हमने अभिषेक किया था
जननी का अरि षोणित से,
हमने श्रिंगार किया था
माता का अरि-मुंडों से,
हमने ही उसे दिया था
सांस्कृतिक उच्च सिंहासन,
माँ जिस पर बैठी सुख से
करती थी जग का शासन,
अब काल चक्र की गति से
वह टूट गया सिंहासन,
अपना तन मन धन देकर
हम करें राष्ट्र आराधन
हम करें राष्ट्र आराधन.. आराधन

तन से, मन से, धन से
तन मन धन जीवन से
हम करें राष्ट्र आराधन
हम करें राष्ट्र आराधन..आराधन

Meaning of difficult words brought to you by

आराधन - worship, adore
निश्चल - calm
निर्मल - pure, clear
अभिवादन - salutation
शैशव - youth, childhood
प्रौढ़ता - adulthood
अर्चन - worship
भवितव्य - destiny
अरि - antagonists
षोणित - N/A (Couldn't find the meaning)

Monday, April 13, 2009

Around the world on trains

Just as so many who grew up in India traveling by trains, I also love traveling by trains. As my dad used to work in Indian Railways, we used to get two free passes to travel by first class anywhere in India. So, we used one of those passes to travel to Delhi every summer. I used to look forward to this journey and get so excited on the day of the travel. The journey back was always painful. Some times, we used to go up to Delhi from Gujarat during Diwali, but almost always, we would make this long journey at least once a year. This was a month long vacation which I used to look forward to. The day long journey, 10 AM to 7 AM the next day was an adventure in itself. So many stations to see, so much of land to discover, people to meet on the train. As I grew older, I used to love standing on the door and get down at every station and then wait for the train to start so that I could run and get on it. This also gave me nightmares of having missed the train at some point but the fun was worth the risk. Traveling by train also served to fulfill my innate curiosity of exploring new lands and people. I was a wanderlust and still believe that "not everyone who doesn't know where he/she is going is lost". Traveling was pleasurable then and comfortable unlike the travel by plane.

So since I am sick and can't really do anything productive with my mind, I let it wander. I let it wander to the deserts of central asia, to the peaks of alps, to the valleys of smokey mountains, to the icy peaks of himalayas and humid river plains of Vietnam and wondered, wouldn't it be awesome if I could go around the world on trains? Carrying with me the message of peace and brotherly love. Raise awareness of common human suffering and climate change. (shh...something good should come out of this) Wouldn't it be awesome to actually see this wonderful world from 5 ft instead of 35000 ft? Yes, that would be great. That is my dream. To be able to one day take the time off and have the resources and courage to go around the world on trains, automobiles and ferries instead of planes. I don't want to travel alone of course, it would be great to travel with others who would love to make this historic journey as well. I do love my life, so it would be great to know which areas to avoid and how to travel through the not so hospitable places without getting noticed/killed.

So I googled this and came up this website -

This website explains how to travel from London to India and beyond but it also has other interesting train rides.

If I were to chose, of course, I would make every train ride going through each continent, but given that a journey around the world itself would be quite time/resource consuming, I came up with this itinerary.

San Francisco - Washington D.C. - New York

then fly over the pond to London.

Follow the London - Paris - Venice - Budapest - Istanbul - Tehran - Quetta - Amritsar route.

Since I have been thinking about doing a similar journey throughout India, go from Amritsar - New Delhi - Ahmedabad - Mumbai - Panaji - Bangalore - Thiruvananthapuram - Kanyakumari - Chennai - Hyderabad - Vizag - Kolkota.

Kolkata - Dhaka. Find a way to get to Yangoon and then to Bangkok - Phom Penh - Saigon - Beijing - Shanghai - Hong Kong - Tokyo and fly back to San Francisco.

Of course not all the cities are connected by train and I will have to travel by bus or ferries at times, but its do able... at least in my dreams. I will do the Trans Siberian, Silk Route, African, and Australian journeys some other time but this would be my first journey around the world on land, if it is a possibility at some point. And I would certainly take way more than 80 days to savor the journey...

Thursday, January 29, 2009

Plastic bottle takes how long to decompose?

These numbers are just mind boggling.

We all know trash in the landfill is not a good idea. It takes a lot of time for things to decompose. We all know recycling is good for the environment. Just how good is it? Just read these numbers to realize how big of a mark you leave on this earth when you don't recycle.

Time Required To Degrade:
  1. Paper - 2 to 5 months
  2. Fruit - 6 months
  3. Plastic Bags - 10-20 years
  4. Diapers - 20 years
  5. Aluminium Cans - 80-100 years
  6. Plastic Bottles - 700 years
  7. Glass Bottles - 1 Million years
There is a visual disintegration timetable here but the numbers are a little different.

Thursday, November 27, 2008

Baron Funds Update

One of the funds in my portfolio must be Baron's so I received a note from them in mail.

Effective 30 days from the date of this Supplement, in connection with Baron Asset Fund, the definition of mid-sized growth company is one having a market capitalization of $1.5 billion to $12 billion at the time of purchase. The Prospectus of the Baron Funds, which currently defines a mid-sized company as one having a market capitalization of $2.5 billion to $10 billion at the time of purchase, is modified as follows: ....

This reminds me of the way you reduce the people living under the poverty line: reduce the line of poverty. Signs of the times we live in.